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सदी के अंत तक 840 करोड़ लोगों पर मंडराने लगेगा डेंगू और मलेरिया का खतरा

हैरानी की बात है कि आज जिस तरह जलवायु में बदलाव आ रह है उसकी वजह से मच्छर उन स्थानों पर भी पनपने लगे हैं, जहां वो पहले नहीं पाए जाते थे

By Lalit Maurya

On: Friday 09 July 2021
 

द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित एक नए अध्ययन से पता चला है कि यदि वैश्विक उत्सर्जन इसी तरह बढ़ता रहा तो सदी के अंत तक करीब 840 करोड़ लोगों पर डेंगू और मलेरिया का खतरा मंडराने लगेगा। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि सदी के अंत तक यदि तापमान में हो रही वृद्धि 3.7 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच जाएगी तो करीब और 470 करोड़ लोग मलेरिया और डेंगू की जद में होंगे। वहीं यदि तापमान में हो रही वृद्धि को 1 डिग्री सेल्सियस पर रोक लिए जाए तो भी यह आंकड़ा 240 करोड़ होगा।

गौरतलब है कि यह दोनों ही बीमारियां मच्छरों के काटने से फैलती हैं। ऐसे में बड़ी हैरानी की बात है कि आज जिस तरह जलवायु में बदलाव आ रह है, उसकी वजह से मच्छर उन स्थानों पर भी पनपने लगे हैं जहां वो पहले नहीं पाए जाते थे।

यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़े आंकड़ों को देखें तो पहले ही दुनिया की आधी आबादी पर डेंगू और मलेरिया का खतरा मंडरा रहा है। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन (एलएसएचटीएम) के नेतृत्व में किया गया यह शोध अंतराष्ट्रीय जर्नल लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित हुआ है। 

अगले 50 वर्षों में चार महीने बढ़ जाएगा डेंगू के प्रसार का मौसम

शोध के अनुसार यदि तापमान इसी तेजी से बढ़ता रहा तो अगले 50 वर्षों में भारत सहित अफ्रीका में मलेरिया के प्रसार का जो समय होता है उसमे एक महीने और डेंगू के प्रसार के समय में करीब चार महीनों का इजाफा हो जाएगा। नतीजन 2078 तक दुनिया की करीब 89.3 फीसदी आबादी (840 करोड़ लोग) उन क्षेत्रों में रह रही होगी जहां मलेरिया के फैलने का खतरा होगा। इसी तरह 2080 तक करीब 850 करोड़ लोग उन स्थानों पर रह रहे होंगे, जहां डेंगू फैलने का खतरा है।

यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी वर्ल्ड मलेरिया रिपोर्ट 2020 में जारी आंकड़ों को देखें तो उसके अनुसार 2019 में मलेरिया के 22.9 करोड़ मामले सामने आए थे, जिनमें से 4.09 लाख लोगों की मौत हो गई थी। वहीं दुनिया की करीब आधी आबादी पर इसका खतरा मंडरा रहा है। इसके सबसे ज्यादा मामले अफ्रीका में सामने आए थे, जबकि इनके कारण होने वाली करीब 90 फीसदी मौतें अफ्रीका में ही हुई थी। वहीं इनमें से करीब 15.6 करोड़ मामले भारत में भी सामने आए थे।

यदि डेंगू को देखें तो वो भी मच्छर से फैलने वाली बीमारी है, जो दुनिया भर में उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में पाया जाता है। इसके ज्यादातर मामले शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। पिछले कुछ दशकों के दौरान इसके मामलों में भी वृद्धि देखी गई है। डब्लूएचओ के अनुसार हर साल दुनिया भर में इसके करीब 40 करोड़ लोग इससे ग्रस्त हो जाते हैं ।

अनुमान है कि दुनिया में करीब 370 करोड़ लोग इसके खतरे की जद में हैं। हालांकि इसके जो मामले सामने आते हैं वो आंकड़ा काफी कम है। 2019 में इसके करीब 52 लाख मामले सामने आए थे, जो पिछले दो दशकों में आठ गुना बढ़ चुके हैं। 

जलवायु परिवर्तन को लेकर यह चिंताएं इसलिए भी जताई जा रही हैं क्योंकि इसके कारण वेक्टर जनित रोगों के फैलने का खतरा काफी बढ़ गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि तापमान में हो रही वृद्धि के चलते मच्छर लम्बे समय तक जीवित रह सकते हैं और उनके काटने की दर में भी वृद्धि हो जाएगी। साथ ही उनमें मौजूद रोगाणु भी तेजी से फैल सकते हैं।  इसकी वजह से इनकी प्रजनन अवधि घट रही है और प्रसार का समय बढ़ गया है। 

रिपोर्ट के अनुसार यदि किसी भी जलवायु परिदृश्य के अनुसार देखें तो सदी के अंत तक एक बड़ी आबादी डेंगू और मलेरिया के खतरों को झेलने के लिए मजबूर हो जाएगी। अनुमान है कि यदि सदी के अंत तक वैश्विक उत्सर्जन शून्य हो जाता है और तापमान में हो रही वृद्धि को हम 1 डिग्री सेल्सियस में रोकने पर सफल हो जाते हैं तो भी सदी के अंत तक करीब और 235 करोड़ लोग मलेरिया और 241 करोड़ अतिरिक्त लोग उन स्थानों पर रह रहे होंगे जहां डेंगू के फैलने का खतरा है। हालांकि यदि अभी से उत्सर्जन को रोकने की दिशा में प्रयास किए जाएं तो इनके प्रभाव को काफी हद तक सीमित किया जा सकता है।